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॥ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

चालीसा संग्रह

October 4, 2013 Akansha Bhardwaj Astrology

 

 

 

 

 

 

ॐ सांई राम~~~

श्री राम चालीसा~~~

श्री रघुबीर भक्त हितकारी । सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी ॥
निशि दिन ध्यान धरै जो कोई । ता सम भक्त और नहिं होई ॥
ध्यान धरे शिवजी मन माहीं । ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं ॥
जय जय जय रघुनाथ कृपाला । सदा करो सन्तन प्रतिपाला ॥
दूत तुम्हार वीर हनुमाना । जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना ॥
तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला । रावण मारि सुरन प्रतिपाला ॥
तुम अनाथ के नाथ गोसाईं । दीनन के हो सदा सहाई ॥
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं । सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ॥
चारिउ वेद भरत हैं साखी । तुम भक्तन की लज्जा राखी ॥
गुण गावत शारद मन माहीं । सुरपति ताको पार न पाहीं ॥
नाम तुम्हार लेत जो कोई । ता सम धन्य और नहिं होई ॥
राम नाम है अपरम्पारा । चारिहु वेदन जाहि पुकारा ॥
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों । तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों ॥
शेष रटत नित नाम तुम्हारा । महि को भार शीश पर धारा ॥
फूल समान रहत सो भारा । पावत कोउ न तुम्हरो पारा ॥
भरत नाम तुम्हरो उर धारो । तासों कबहुँ न रण में हारो ॥
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा । सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ॥
लषन तुम्हारे आज्ञाकारी । सदा करत सन्तन रखवारी ॥
ताते रण जीते नहिं कोई । युद्ध जुरे यमहूँ किन होई ॥
महा लक्ष्मी धर अवतारा । सब विधि करत पाप को छारा ॥
सीता राम पुनीता गायो । भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ॥
घट सों प्रकट भई सो आई । जाको देखत चन्द्र लजाई ॥
सो तुमरे नित पांव पलोटत । नवो निद्धि चरणन में लोटत ॥
सिद्धि अठारह मंगल कारी । सो तुम पर जावै बलिहारी ॥
औरहु जो अनेक प्रभुताई । सो सीतापति तुमहिं बनाई ॥
इच्छा ते कोटिन संसारा । रचत न लागत पल की बारा ॥
जो तुम्हरे चरनन चित लावै । ताको मुक्ति अवसि हो जावै ॥
सुनहु राम तुम तात हमारे । तुमहिं भरत कुल- पूज्य प्रचारे ॥
तुमहिं देव कुल देव हमारे । तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ॥
जो कुछ हो सो तुमहीं राजा । जय जय जय प्रभु राखो लाजा ॥
रामा आत्मा पोषण हारे । जय जय जय दशरथ के प्यारे ॥
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा । निगुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा ॥
सत्य सत्य जय सत्य- ब्रत स्वामी । सत्य सनातन अन्तर्यामी ॥
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै । सो निश्चय चारों फल पावै ॥
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं । तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं ॥
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा । नमो नमो जय जापति भूपा ॥
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा । नाम तुम्हार हरत संतापा ॥
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया । बजी दुन्दुभी शंख बजाया ॥
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन । तुमहीं हो हमरे तन मन धन ॥
याको पाठ करे जो कोई । ज्ञान प्रकट ताके उर होई ॥
आवागमन मिटै तिहि केरा । सत्य वचन माने शिव मेरा ॥
और आस मन में जो ल्यावै । तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ॥
साग पत्र सो भोग लगावै । सो नर सकल सिद्धता पावै ॥
अन्त समय रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ॥
श्री हरि दास कहै अरु गावै । सो वैकुण्ठ धाम को पावै ॥

दोहा~~~

सात दिवस जो नेम कर पाठ करे चित लाय ।
हरिदास हरिकृपा से अवसि भक्ति को पाय ॥
राम चालीसा जो पढ़े रामचरण चित लाय ।
जो इच्छा मन में करै सकल सिद्ध हो जाय ॥

जय सांई राम~~~

श्री शनि चालीसा~~~

दोहा~~

जय गणेश गिरिजा सुवन मंगल करण कृपाल ।
दीनन के दुख दूर करि कीजै नाथ निहाल ॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु सुनहु विनय महाराज ।
करहु कृपा हे रवि तनय राखहु जनकी लाज ॥

जयति जयति शनिदेव दयाला । करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥
चारि भुजा तनु श्याम विराजै । माथे रतन मुकुट छबि छाजै ॥
परम विशाल मनोहर भाला । टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके । हिये माल मुक्तन मणि दमकै ॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा । पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥
पिंगल कृष्णो छाया नन्दन । यम कोणस्थ रौद्र दुख भंजन ॥
सौरी मन्द शनी दश नामा । भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥
जापर प्रभु प्रसन्न हवैं जाहीं । रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं ॥
पर्वतहू तृण होइ निहारत । तृणहू को पर्वत करि डारत ॥
राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो । कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥
बनहूँ में मृग कपट दिखाई । मातु जानकी गई चुराई ॥
लषणहिं शक्ति विकल करिडारा । मचिगा दल में हाहाकारा ॥
रावण की गति- मति बौराई । रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥
दियो कीट करि कंचन लंका । बजि बजरंग बीर की डंका ॥
नृप विक्रम पर तुहिं पगु धारा । चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥
हार नौंलखा लाग्यो चोरी । हाथ पैर डरवायो तोरी ॥
भारी दशा निकृष्ट दिखायो । तेलहिं घर कोल्हू चलवायो ॥
विनय राग दीपक महँ कीन्हयों । तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥
हरिश्चंद्र नृप नारि बिकानी । आपहुं भरें डोम घर पानी ॥
तैसे नल पर दशा सिरानी । भूंजी- मीन कूद गई पानी ॥
श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई । पारवती को सती कराई ॥
तनिक वोलोकत ही करि रीसा । नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ॥
पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी । बची द्रौपदी होति उघारी ॥
कौरव के भी गति मति मारयो । युद्ध महाभारत करि डारयो ॥
रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला । लेकर कूदि परयो पाताला ॥
शेष देव- लखि विनति लाई । रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥
वाहन प्रभु के सात सुजाना । जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी । सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं । हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं ॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा । सिंह सिद्धकर राज समाजा ॥
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै । मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी । चोरी आदि होय डर भारी ॥
तैसहि चारी चरण यह नामा । स्वर्ण लौह चाँदि अरु तामा ॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं । धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥
समता ताम्र रजत शुभकारी । स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी ॥
जो यह शनि चरित्र नित गावै । कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥
अद्भूत नाथ दिखावैं लीला । करैं शत्रु के नशिब बलि ढीला ॥
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई । विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत । दीप दान दै बहु सुख पावत ॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा । शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥

दोहा~~

पाठ शनीश्चर देव को कीन्हों ‘ विमल ‘ तय्यार ।
करत पाठ चालीस दिन हो भवसागर पार ॥
जो स्तुति दशरथ जी कियो सम्मुख शनि निहार ।
सरस सुभाष में वही ललिता लिखें सुधार ।

जय सांई राम~~~
श्री कृष्ण चालीसा~~~

बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम ।

अरुण अधर जनु बिम्ब फल, नयन कमल अभिराम ।।

पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज ।

जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज ।।

जय यदुनन्दन जय जगवन्दन । जय वसुदेव देवकी नन्दन ।।

जय यशुदा सुत नन्द दुलारे । जय प्रभु भक्तन के दृग तारे ।।

जय नट-नागर नाग नथइया । कृष्ण कन्हैया धेनु चरइया ।।

पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो । आओ दीनन कष्ट निवारो ।।

वंशी मधुर अधर धरि टेरो । होवे पूर्ण विनय यह मेरो ।।

आओ हरि पुनि माखन चाखो । आज लाज भारत की राखो ।।

गोल कपोल, चिबुक अरुणारे । मृदु मुस्कान मोहिनी डारे ।।

राजित राजिव नयन विशाला । मोर मुकुट वैजन्ती माला ।।

कुण्डल श्रवण पीत पट आछे । कटि किंकणी काछनी काछे ।।

नील जलज सुन्दर तनु सोहे । छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे ।।

मस्तक तिलक, अलक घुंघराले । आओ कृष्ण बांसुरी वाले ।।

करि पय पान, पूतनहि तारयो । अका बका कागासुर मारयो ।।

मधुबन जलत अगिन जब ज्वाला । भै शीतल, लखतहिं नन्दलाला ।।

सुरपति जब ब्रज चढ्यो रिसाई । मसूर धार वारि वर्षाई ।।

लगत-लगत ब्रज चहन बहायो । गोवर्धन नख धारि बचायो ।।

लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई । मुख महं चौदह भुवन दिखाई ।।

दुष्ट कंस अति उधम मचायो । कोटि कमल जब फूल मंगायो ।।

नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें । चरणचिन्ह दै निर्भय कीन्हें ।।

करि गोपिन संग रास विलासा । सबकी पूरण करि अभिलाषा ।।

केतिक महा असुर संहारयो । कंसहि केस पकड़ि दै मारयो ।।

मात-पिता की बन्दि छुड़ाई । उग्रसेन कहं राज दिलाई ।।

महि से मृतक छहों सुत लायो । मातु देवकी शोक मिटायो ।।

भौमासुर मुर दैत्य संहारी । लाये षट दश सहसकुमारी ।।

दै भीमहिं तृण चीर सहारा । जरासिंधु राक्षस कहं मारा ।।

असुर बकासुर आदिक मारयो । भक्तन के तब कष्ट निवारयो ।।

दीन सुदामा के दुख टारयो । तंदुल तीन मूंठि मुख डारयो ।।

प्रेम के साग विदुर घर मांगे । दुर्योधन के मेवा त्यागे ।।

लखि प्रेम की महिमा भारी । ऐसे याम दीन हितकारी ।।

भारत के पारथ रथ हांके । लिए चक्र कर नहिं बल ताके ।।

निज गीता के ज्ञान सुनाये । भक्तन हृदय सुधा वर्षाये ।।

मीरा थी ऐसी मतवाली । विष पी गई बजा कर ताली ।।

राना भेजा सांप पिटारी । शालिग्राम बने बनवारी ।।

निज माया तुम विदिहिं दिखायो । उर ते संशय सकल मिटायो ।।

तब शत निन्दा करि तत्काला । जीवन मुक्त भयो शिशुपाला ।।

जबहिं द्रौपदी टेर लगाई । दीनानाथ लाज अब जाई ।।

तुरतहिं बसन बने नन्दलाला । बढ़े चीर भै अरि मुँह काला ।।

अस नाथ के नाथ कन्हैया । डूबत भंवर बचावइ नइया ।।

सुन्दरदास आस उर धारी । दया दृष्टि कीजै बनवारी ।।

नाथ सकल मम कुमति निवारो । क्षमहु बेगि अपराध हमारो ।।

खोलो पट अब दर्शन दीजै । बोलो कृष्ण कन्हैया की जै ।।

दोहा~~

यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि ।

अष्ट सिद्घि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि ।।

जय सांई राम~~~
श्री गणेश चालीसा~~~

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल ।

विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल ।।

जय जय जय गणपति गणराजू । मंगल भरण करण शुभ काजू ।।

जै गजबदन सदन सुखदाता । विश्व विनायक बुद्घि विधाता ।।

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन । तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ।।

राजत मणि मुक्तन उर माला । स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ।।

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ।।

सुन्दर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ।।

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता । गौरी ललन विश्व-विख्याता ।।

ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे । मूषक वाहन सोहत द्घारे ।।

कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी । अति शुचि पावन मंगलकारी ।।

एक समय गिरिराज कुमारी । पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी ।

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा । तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा ।।

अतिथि जानि कै गौरि सुखारी । बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ।।

अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा । मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ।।

मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला । बिना गर्भ धारण, यहि काला ।।

गणनायक, गुण ज्ञान निधाना । पूजित प्रथम, रुप भगवाना ।।

अस कहि अन्तर्धान रुप है । पलना पर बालक स्वरुप है ।।

बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना । लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना ।।

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं । नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं ।।

शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं । सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं ।।

लखि अति आनन्द मंगल साजा । देखन भी आये शनि राजा ।।

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं । बालक, देखन चाहत नाहीं ।।

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो । उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो ।।

कहन लगे शनि, मन सकुचाई । का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई ।।

नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ । शनि सों बालक देखन कहाऊ ।।

पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा । बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा ।।

गिरिजा गिरीं विकल है धरणी । सो दुख दशा गयो नहीं वरणी ।।

हाहाकार मच्यो कैलाशा । शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा ।।

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो । काटि चक्र सो गज शिर लाये ।।

बालक के धड़ ऊपर धारयो । प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ।।

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे । प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे । ।

बुद्घि परीक्षा जब शिव कीन्हा । पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ।।

चले षडानन, भरमि भुलाई । रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई ।।

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें । तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ।।

तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई । शेष सहसमुख सके न गाई ।।

मैं मतिहीन मलीन दुखारी । करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी ।।

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा । जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा ।।

अब प्रभु दया दीन पर कीजै । अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै ।।

दोहा~~

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान । नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान ।।

सम्बन्ध अपने सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश । पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश ।।

ॐ सांई राम~~~

श्री भैरव चालीसा~~~

दोहा~~

श्री गणपति, गुरु गौरि पद, प्रेम सहित धरि माथ ।

चालीसा वन्दन करों, श्री शिव भैरवनाथ ।।

श्री भैरव संकट हरण, मंगल करण कृपाल ।

श्याम वरण विकराल वपु, लोचन लाल विशाल ।।

जय जय श्री काली के लाला । जयति जयति काशी-कुतवाला ।।

जयति बटुक भैरव जय हारी । जयति काल भैरव बलकारी ।।

जयति सर्व भैरव विख्याता । जयति नाथ भैरव सुखदाता ।।

भैरव रुप कियो शिव धारण । भव के भार उतारण कारण ।।

भैरव रव सुन है भय दूरी । सब विधि होय कामना पूरी ।।

शेष महेश आदि गुण गायो । काशी-कोतवाल कहलायो ।।

जटाजूट सिर चन्द्र विराजत । बाला, मुकुट, बिजायठ साजत ।।

कटि करधनी घुंघरु बाजत । दर्शन करत सकल भय भाजत ।।

जीवन दान दास को दीन्हो । कीन्हो कृपा नाथ तब चीन्हो ।।

वसि रसना बनि सारद-काली । दीन्यो वर राख्यो मम लाली ।।

धन्य धन्य भैरव भय भंजन । जय मनरंजन खल दल भंजन ।।

कर त्रिशूल डमरु शुचि कोड़ा । कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोड़ा ।।

जो भैरव निर्भय गुण गावत । अष्टसिद्घि नवनिधि फल पावत ।।

रुप विशाल कठिन दुख मोचन । क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन ।।

अगणित भूत प्रेत संग डोलत । बं बं बं शिव बं बं बोतल ।।

रुद्रकाय काली के लाला । महा कालहू के हो काला ।।

बटुक नाथ हो काल गंभीरा । श्वेत, रक्त अरु श्याम शरीरा ।।

करत तीनहू रुप प्रकाशा । भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा ।।

रत्न जड़ित कंचन सिंहासन । व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन ।।

तुमहि जाई काशिहिं जन ध्यावहिं । विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं ।।

जय प्रभु संहारक सुनन्द जय । जय उन्नत हर उमानन्द जय ।।

भीम त्रिलोकन स्वान साथ जय । बैजनाथ श्री जगतनाथ जय ।।

महाभीम भीषण शरीर जय । रुद्र त्र्यम्बक धीर वीर जय ।।

अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय । श्वानारुढ़ सयचन्द्र नाथ जय ।।

निमिष दिगम्बर चक्रनाथ जय । गहत अनाथन नाथ हाथ जय ।।

त्रेशलेश भूतेश चन्द्र जय । क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय ।।

श्री वामन नकुलेश चण्ड जय । कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय ।।

रुद्र बटुक क्रोधेश काल धर । चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर ।।

करि मद पान शम्भु गुणगावत । चौंसठ योगिन संग नचावत ।

करत कृपा जन पर बहु ढंगा । काशी कोतवाल अड़बंगा ।।

देयं काल भैरव जब सोटा । नसै पाप मोटा से मोटा ।।

जाकर निर्मल होय शरीरा। मिटै सकल संकट भव पीरा ।।

श्री भैरव भूतों के राजा । बाधा हरत करत शुभ काजा ।।

ऐलादी के दुःख निवारयो । सदा कृपा करि काज सम्हारयो ।।

सुन्दरदास सहित अनुरागा । श्री दुर्वासा निकट प्रयागा ।।

श्री भैरव जी की जय लेख्यो । सकल कामना पूरण देख्यो ।।

दोहा ~~

जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार ।

कृपा दास पर कीजिये, शंकर के अवतार ।।

जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार ।

उस घर सर्वानन्द हों, वैभव बड़े अपार ।।

जय सांई राम~~~

 

 

 

 

 

 


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